प्रिय सुमति
क्षोभ अधिक है, लेकिन दुख जनित है।
बहुत दिनो तक दबा कर रखने ले लिये मजबूर किया तुमने इसीलिये तुमसे बात कम होती जाती है।
मेरी हर बात को तुमने तोड़ मरोड़ कर रख दिया है- हमारी मित्रता कितने दिन ऐसे चलेगी? तुम तो निभा ले जाओगी। लेकिन मैं किसी फूटी बॉटल पर हेमा मालिनी स्टाइल में नाचने के लिये तैयार नहीं- कम कम से कम तुम्हारे मन में बैठे imaginary गब्बर के लिये तो कतई नहीं।
किस लिये इतनी कुरबानियां दे रही हो थोड़ा सोच लो- फलाने जी ने बुरा बोला, तुमने निर्णय लिया कि कभी नहीं बात करोगी।
यार तुम्हारी ससुराल का कुत्ता भी माननीय है, पर यह सारे संसार को अपना घर इस तरह मत बनाओ. सीमा रेखा यूं न हो कि अपने घर का कूड़ा दूसरे के दरवाजे के सामने फेंक दिया और दरवाजा बन्द कर के बैठ गये।
थोड़ा विवेक तुम ही रख लो.
जो अपनी समस्याओं से थके चटे हैं वे दूसरों के लिये क्या कर सकते हैं- वही अादमी पहले पहल कितना भद्र व्यवहार करता था। मेहनती भी था। अब परेशान हो गया है- तो उसकी मदद करो। उसकी जिम्मेदारी किसे दे दी जाये यह सोचने की कोशिश करो।
कोई अागे अाकर बोझ बाँटने वाले हैं नहीं।शायद हमें भी थोड़ा हाथ झाड़ कर खड़े हो जाना चाहिये। मेरे कठोर बोलने पर गालियाँ पड़ती थीं- घर में भी और बाहर भी- इस बार तो सब ठीक चलता गया- तालियां बजी ना? तो तैयारी तो है ना? साबित तो कर दिया!!
मेरी तैयारी है, और मुझे समझने की दूसरों में भी है या उन्हें बनानी होगी।
जो मुझे मिला है जब वह चुक जायेगा तो ही नया कुछ अच्छा होगा। तब तक बीच बीच में गड़बड़ होगी ही। पूर्व जन्म के पाप तो सबके होते हैं यार- मैं बुरा बोलती हूँ तो जो सुनते हैं उनका भी तो कोई प्रारब्ध है? क्यों किसीको मेरी गाली भी मीठी लगती है, और किसीको प्रेम पाश फाँसी का फन्दा? वे भी तो अात्म विवेचन करें।
लेकिन तुम्हारा क्या करें सुमति?
तुम तो भजन में नहीं अातीं कि लोग गाते अच्छा नहीं और मुझे ठीक ढंग से बोलना नहीं अाता इसलिये चुप रहने को कहती हो।
सुमति, तुम्हारा तरीका अच्छा तो है, पर दुनिया अागे बढ़ गई। कम से कम मैं तो बढ़ ही गई- तुम्हारा ही योगदान है। अब तो कबिरा खड़ा बाजार में- जहाँ देखती हूँ बाजार ही तो है- बच्चों को वन्दे मातरम गाने के लिये चाकलेट का प्रलोभन , समन्विता क्लब में अाओ या नहीं ५०/- देने का सुझाव।
मेरा हिसाब थोड़ा अलग है, मैं तो अारती में भी गा कर सोचती हूँ कि मैने अारती के पैसे नहीं दिये तो भगवान समझता है कि मेरा भाव सेवा का है।
फिर भगवान की भी तो कोई जिम्मेदारी है मेरे प्रति कि नहीं? गलत कहती हूँ तो बोलने से रोकता क्यों नहीं?
जिसे अपनी भावना पर विश्वास नहीं, वह चुप रह सकता है- मेरे लिये यह संभव नहीं।
तुम ठीक नहीं कर रहीं - अब तुम्हें भी नहीं बक्शूंगी। :)
अकेले में तुमने मेरा साथ इतना नहीं दिया कि मैं तु्म्हारे सहारे चल सकूँ- अौर अब तुम्हें दोष नहीं देती- जितने साथ की मुझे अावश्यकता है भगवान देता है।
अति हो चली.
सही गलत तो अब सब के सामने तय होगा।
हम तो सड़क पर ही सुरक्षित हैं - कम से कम वहाँ ससुरालिया ढोंग बाजी नहीं होती और गौरा का पीहर नहीं होता- जितना कमाई करेंगे उतना खायेंगे- बाकी भीख है।
मरोगी तो तुम भी हम भी। हमें विश्वास नहीं कि इस सोसायटी में कोई हमारे लिये कुछ करेगा। देखो, तुमने फोन करके अमेरिका में वन्दना की सास की बाबत खबर की- लेकिन समन्विता क्लब में उनके लिये मौन तभी रखा गया जब महीनों बाद मैं अाई.
खुद ही सब कुछ नहीं कर सकता कोई भी। क्लब की मीटिंग तो हुई थीं , जब श्रीमती ढींगरा को श्रद्धांजली नहीं दी गई तो किसकी जिम्मेदारी थी? तुमने उसे चेताया? उसने माफी क्यों नहीं मांगी? सार्वजनिक रूप से? value education में ये जिम्मेदारी नहीं होती क्या?
अगर तुम्हारी अहिंसा से कोई समझ नहीं रहा तो कुछ तो अात्म विवेचन तुम्हें भी करना होगा। गान्धी को भी सतत प्रयत्न करना होता था- तुम तो रोटी पानी में ही लगी रहती हो। लेकिन तुम करो भी क्या। मजबूरी है तुम्हारी। मोरारी बापू को सुनने का काम बहुएं करती हों तो सास को रोटी में लगना ही होता है।
लगे रहो मुन्ना भाई कहती हो!! तुम बहुत चूक रही हो सुमति।
अाशा है कि मुझे गलत साबित करोगी।
सस्नेह
स्मिता
Thursday, February 04, 2010
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